Inspired from a line by (late) Meena Kumari, actress & Poet
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एहसास ए बेकराँ पे यह सरहद कैसी
दर ओ दीवार कहाँ रूह की आवारगी के
मुक़फ्फल कब होने लगे तसव्वुर के पाँव
कौन पहना सका बेडियाँ तेरे ख़यालों को
सलाख़ें कब रोक पाँए ज़िद्दी अरमानों को
शुक्र, के ज़िनदान ए ख्वाहिश न बना सका कोई
है ख्वाब अभी तलक बेहद ओ बेहिसार
आरज़ू के लब अभी तलक बेमोहर
क़ाबू में ले सका न कोई तेरे हौसलों को
ऐ दोस्त,
तेरी खूबियाँ इन्हीं बातों से है
कोई वजह नहीं बरतरफ करने की
इन्हें तू यूँ ही महफूज़ रखना
इसी जगह तू क़ायम रहना
खुद ऐतमाद तेरा राज़ है परवाज़ का
तू अनंत है
तू ला इंतहा है
तू कामिल है
खुदा का अक्स है तू
हू ब हू खु़दा है तू
हू ब हू खुदी है तू

– मुआसिर (oct 2013)

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