सुरूरनगर, हैदराबाद
Dec 25, 2013

है यह जगह कितनी रूहानी
अखियों में क्यों लाता है पानी
वो लम्हें, क़िस्से, वो यादें
हैं अनमोल, अगरचः लगे बे मायनी

वो नीम का पेड़
वो बादाम के पत्ते
वो ज़र्द फूलों का शजर
वो आम की डाली
सर निगूं क़ामत क़द नारियल
वो निम्बू का ख़ार जो सीढियों पर
रास्ता रोके खड़ा है
जैसे मुझ से ख़फा हो
यह सारे मेरे गहरे मित्र हैं

जब भी मैं घर लौटता हँू
यूँ लगता कि मेरे यार
जाने कितने बरसों से
मेरे इंतज़ार में रहते हैं
यूँ लगता है, तन्हाई में
मुझसे मिलने को बे क़रार रहते हैं
कभी काँधा थप-थपाकर
तो कभी सर-गोशियों से
छत पर आने का इशारा करते हैं
मेरा हाल जानने को इच्छुक और
आपबीती सुनाने को बेचैन

कुछ खिली-खिली बातें
कुछ गुम-सुम सी यादें
कहीं ह़ाल ही के वाक़ये
कभी माज़ी के नग़में
इनके दरमियाँ एक बात नहीं भूलते
कभी शिक़वे के रूप में कभी मशवरे के लिबास में
“कब लौट आएगा तू
कब घर आएगा तू”
किसी तरह मैं टाल देता हँू उनको तो
हालांकि करते तो हैं मेरे दिल ही की बात

इनका मैं शुक्रगुज़ार हूँ
इनका मैं अहसानमंद हँू
यह मेरे ज़ईफ़ वालदैन के वफ़ादार हैं
रहे माता पिता के सेवादार हैं
उनके रहे पहरेदार बेमिसाल हैं
यूँ ही हुए खड़े साल-ओ-साल हैं

इन्हीं यारों के गले मिलकर
अपने माँ बाप के चरण छूकर
अखियों में आता है पानी
और समझ आता है, ये जगह
क्यों है मेरे लिए जा-ए-रूहानी

– मुआसिर

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