सुबह शाम चूल्हे के धुँए अब निकलते नहीं
ग़रीब फाकः कशी का कहर झेल रहा है
चावल-गंदुम देखने अजायब घर जाता है
साल भर का पैसा जब जोड लेता है तो
दिवाली को चार-तोले प्याज घर ज़रूर आता है
कहने को food security bill आया तेरे लिए मगर
उसका बुनियादी मकसद वोटों की security है
कोई party नहीं जिसको इससे एतराज़ है क्योंकि
यह उनके पैसे बटोरने का एक अहम ज़रिया होगा
तुझ ग़रीब को झाँसे में रखने का एक बिल होगा
सियासतदानों के पेट पूजा को एक और बिल होगा

ऐ tax-payer!
तू क़मर और ज़रा कस ले
तेरा हिन्दुस्तान अब बच नहीं सकता
कम अज़ कम अपनी ज़िन्दगी ठीक कर ले
सोच तरीके़ टैक्स बचाने के
सोच तरीके़ टेढ-कमाई के
तू इस देस को बदल नहीं सकता
अपना देश बदलने की सोच
NRI बरादराऩ की तरह

ऐ ग़रीब,
तू जान ले, तेरा कुछ हो नहीं सकता
हाँ, इतना ज़रूर
तू दुनिया भर में मशहूर हो चुका है
कि सियासतदानों का पेट तुमसे पलता है
उसकी तिजोरियों जो पैसा है
उसमें तेरा नामोनशाँ है
वसीअत तेरे नाम की ही रखी है
उसमें से पसीने की बू मेरी ही आती है
मेरे सूखे खूँ के धबबे हैं उसपर
मगर उँगलियों के निशाँ मेरे हैं न तेरे
जाँचकर देखा तो नाम मिले मुझे कई
कहीं किसी राॅबरट के उँगलियों के निशान थे
तो कहीं यादव, कहीं शुषमा या सिंह
कहीं राहुल तो कहीं रेड्डी

अब वक़्त ज़ाया न कर
अपनी शिकस्त मान ले
और चलाचल अपने रास्ते
यह देश ठेकेदार के हवाले
एक बार फिर हो चला है
फ़र्क बस इतना है के यह ठेकेदार
देशी है, गोरा नहीं दिखता
दिखता तुझसा और मुझसा ही है
बस यह तू अब जान ले
यह हिन्दुस्तान अब तेरा नहीं
यह हिन्दुस्तान अब तेरा नहीं

– मुआसिर

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